भगवान शिव के व्यंग से दुखी होकर मां काली बनी थी माता गौरी

  • नवरात्र में सप्तमी को मां कालरात्रि, तो अष्टमी तिथिा को होती है मां गौरी की पूजा
  • इस बीच शुंभ-निशुंभ वध का बना था संयोग: महेन्द्र पांडेय

गिरिडीह। नवरात्र की अष्टमी तिथि को माँ शक्ति की आठवीं विभूति गौरी की पूजा की जाती है। नवरात्र के सातवें दिन कालरात्रि (काली) की पूजा होती है, क्योंकि काली ही भगवान शिव के व्यंग से दुखी होकर माता गौरी बन गई। इसलिए काली की पूजा के बाद माँ गौरी की पूजा की जाती है। माता गौरी को शिवा, उमा और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। गिरिडीह के जाने माने पुरोहित महेन्द्र पांडेय बताते है कि मां पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष की पुत्री सती थी जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। दक्ष द्वारा शिव का अपमान किये जाने के कारण सती दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ के हवन कुंड में आत्मदाह कर लेती है। सती का अगला जन्म हिमाचल की पुत्री पार्वती के रुप में हुई। पार्वती ने पुनः शिव को पति रुप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। कठोर तप के कारण शरीर काला पड़ गया। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी पुनः पार्वती को पत्नी रुप में स्वीकार कर लेते है।

बताया कि एक बार इंद्रलोक पर असुरों का राजा शुभ और उसका छोटा भाई निशुंभ आक्रमण कर स्वर्ग से देवताओं को भगा दिया। शिवजी यह जानते थे कि देवताओं को पार्वती ही कष्ट से मुक्त कर सकती है। इसलिए एक दिन शिवजी ने पार्वती पर व्यंग्य करते हुए कहा कि तुम काली हो। माता पार्वती को यह बात दिल पर लग गयी। पार्वती ने शिवजी से कहा कि आपने मुझे काली कहा, मैं आपको गोरी होकर दिखाऊंगी। पार्वती के कठोर तपस्या से शिवजी प्रसन्न हुए और पार्वती से कहा कि तुम गंगा स्नान करो, इससे तुम गौर वर्ण हो जाओगी और गौरी कहलाओगी। पार्वती जब गंगा स्नान कर रही थी उसी समय गंगा तट पर स्वर्ग प्राप्ति के लिए सभी देवता आदि शक्ति की आराधना करने लगे। माता ने देवताओं की आराधना से प्रसन्न होकर कहा, आप सब निश्चिंत होकर जाएं। शुंभ-निशुंभ का वध करके सभी देवताओं को कष्टों से मुक्ति दिलाऊंगी।


गंगा स्नान के पश्चात माता पार्वती गौर वर्ण की हो गयी और उनके शरीर से श्यामल वर्ण कौशिकी प्रकट हुई। माता पार्वती की आज्ञा से देवी कौशिकी ने शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। शिवजी ने पार्वती को समझाया कि काली कहकर व्यंग्य करने के पीछे उनका उद्देश्य कौशिकी का जन्म था। इस उद्देश्य के पूरा हुए बिना शुंभ-निशुंभ का वध संभव नहीं था।

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