महेंद्र सिंह: क्रांतिकारी बिसात के साहसी योद्धा

16 जनवरी शहादत दिवस पर विशेष
कंचन सिन्हा
गिरिडीह। क्रांतिकारी राजनीति में साहसी नेताओं की जब भी बात होगी, निःसंदेह महेंद्र सिंह अग्रिम पंक्ति में नजर आएंगे। मौत का स्वागत जीवन के बसंत की तरह आत्मसात करने वाले क्रांतिकारी विसात के साहसी योद्धा महेंद्र सिंह ने सड़क से लेकर सदन तक, इतना ही नहीं जनता की हिफाजत के लिए जीवन के अंतिम क्षण तक इस साहस को अक्षुण्ण रखा।
मानवीय मूल्यों को जीवंत बनाने के लिए इंकलाब की राह चुनने वाले महेंद्र सिंह को मौत का इल्म सपने में भी नहीं सताता था। जिंदगी का एक-एक लम्हा इंकलाब की रफ्तार को तेज करने में गुजार देने के जज्बे के साथ राजनीतिक जीवन में प्रवेश करने वाले महेंद्र सिंह का जन्म गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड स्थित सुदूरवर्ती गांव खम्भरा में 22 फरवरी 1954 में हुआ था। गांव में ही स्कूली शिक्षा पाने वाले महेंद्र सिंह घुमक्कड़ स्वभाव के व्यक्ति थे।
उच्च शिक्षा से वंचित रह कर भी उन्होंने स्वाध्याय के जरिये न सिर्फ राजनीति शास्त्र, बल्कि दर्शन शास्त्र और अर्थ शास्त्र में गहरी पकड़ बनायी थी। भाकपा(माले) लिबरेशन के झंडे तले बगोदर और पुरे गिरिडीह जिले में सघन राजनीतिक आंदोलन को संगठित कर उसका कुशल नेतृत्व भी किया। गरीब-गुरबों की लड़ाई में हमेशा आगे रहने वाले महेंद्र सिंह ने जनवादी अधिकार के आंदोलनों की गोलबंदी को ओर भी व्यापक बनाया। 1990 में आइपीएफ के बैनर तले और 95 व 2000 में भाकपा(माले) से बगोदर का विधायक रहे महेंद्र सिंह ने जनांदोलनों के नेतृत्व के कारण कई फर्जी मुकदमों में कारावास भी झेला था। विधायक रहने के दौरान आंकड़ों पर आधारित उनके लेख अखबारों की सुर्खियां बनती थी। जनतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले महेंद्र सिंह को एक आदर्श कम्युनिस्ट नैतिकता का जीवन व्यवहार खास बनाता गया। उनसे मिलने वाले विरोधी भी उनसे मिलकर उन्ही के मुरीद हो जाते थे। मार्क्सवाद के सूत्रों को देसी उदाहरणों से लोगों तक पहुचाने की अद्भूत कला उन्हें ज्ञात था और एक जननायक की तरह वे गम्भीर विषयों की सरल व्याख्या करने में भी वे माहिर थे। जल-जंगल-जमीन से वृहत्तर सम्बंध में महेंद्र सिंह मार्क्सवादी दर्शन को जोड़ते थे।
महेंद्र सिंह जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए अक्सर कहा करते थे मै झूठा वायदा नहीं करता, मै आपको धोखा नहीं दे सकता, मै आपके सुख-दुख का साथी हूं, मै आपकी लड़ाई का साझेदार हूं, मै इससे पीछे नहीं भाग सकता। यही कारण है कि बगोदर या गिरिडीह जिला ही नहीं एकीकृत बिहार और बाद में बनी झारखंड के शोषित-पीड़ित आवाम हर मौके पर महेंद्र सिंह को ही याद करते थे। आवाम को भरोसा था कि महेंद्र सिंह हक और अधिकार की एक ऐसी आवाज हैं, जिन्हें कतई दबाया नहीं जा सकता।
16 जनवरी 2005 को उनके अपने विधानसभा क्षेत्र के दुर्गी धवेया गांव में ग्राम सभा को सम्बोधित करने के बाद ग्रामीणों से बात कर रहे महेंद्र सिंह को कतिपय बंदूकधारियों ने मौत की नींद सुला दिया। यहां यह विचार करना जरूरी है कि महेंद्र सिंह की जनअदालत से किसे खतरा था। जनता की जनवादी अधिकारों के लिए सड़क से सदन तक उनकी बुलंद आवाज से कौन सी ताकतें परेशान होती थी। शायद उनकी हत्या के साजिशकर्ता ऐसी ही ताकतें हो। बहरहाल महेन्द्र सिंह के बताए रास्ते पर जनवाद पसंद ताकतें अब भी पुरी शिद्दत से जुटी हैं।
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